Ritlal Yadav: पूर्व विधायक रीतलाल यादव को हाई कोर्ट से बड़ा झटका, जमानत याचिका खारिज

Ritlal Yadav: बिहार की राजनीति और अपराध जगत से जुड़ा एक बड़ा नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। दानापुर ... Read more

On: Thursday, February 26, 2026 6:14 PM
Ritlal Yadav

Ritlal Yadav: बिहार की राजनीति और अपराध जगत से जुड़ा एक बड़ा नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। दानापुर के पूर्व विधायक रीतलाल यादव की आजादी पर लगा सस्पेंस आखिरकार खत्म हो गया है। लंबे समय से जमानत की उम्मीद लगाए बैठे रीतलाल यादव (Ritlal Yadav) को पटना हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने गंभीर आरोपों और उनके आपराधिक इतिहास को देखते हुए नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि फिलहाल उनकी रातें जेल में ही कटेंगी।

यह मामला सिर्फ एक नेता की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में अपराध और राजनीति के रिश्ते पर भी बड़ा संदेश देता है। कोर्ट के इस फैसले को कानून व्यवस्था और न्यायिक सख्ती के नजरिए से अहम माना जा रहा है।

Ritlal Yadav: संगठित अपराध और रंगदारी के आरोपों ने बढ़ाई मुश्किलें

रीतलाल यादव (Ritlal Yadav) के खिलाफ दर्ज मामला खगौल थाना कांड संख्या 171/2025 से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि उन्होंने रंगदारी के जरिए अवैध वसूली, दबंगई के बल पर जमीन कब्जाने और एक संगठित आपराधिक गिरोह चलाने जैसे गंभीर अपराधों में भूमिका निभाई। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी का क्षेत्र में इतना प्रभाव रहा है कि लोगों में भय का माहौल बन गया था। जांच एजेंसियों का तर्क था कि यदि उन्हें जमानत मिलती है तो गवाहों और जांच प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में बिहार के कई जिलों में भूमि विवाद और रंगदारी से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। ऐसे मामलों में अदालतें अब पहले की तुलना में ज्यादा सख्त रुख अपनाती नजर आ रही हैं, ताकि संगठित अपराध पर नियंत्रण पाया जा सके।

हाई कोर्ट में तीखी बहस के बाद आया फैसला

मामले की सुनवाई जस्टिस सत्यव्रत वर्मा की एकल पीठ में हुई, जहां दोनों पक्षों ने विस्तार से अपनी दलीलें रखीं। बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने जमानत की मांग करते हुए कहा कि आरोपी जांच में सहयोग कर रहे हैं और उन्हें राहत दी जानी चाहिए। वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने इसका कड़ा विरोध किया। सरकारी पक्ष ने अदालत को पुलिस डायरी और केस से जुड़े साक्ष्यों की जानकारी देते हुए बताया कि आरोपी का आपराधिक इतिहास लंबा और गंभीर है।

सभी तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अपराध की प्रकृति और रिकॉर्ड को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

40 मुकदमों का रिकॉर्ड बना सबसे बड़ी बाधा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि रीतलाल यादव (Ritlal Yadav) के खिलाफ विभिन्न थानों में करीब 40 आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें रंगदारी, जमीन कब्जा, धमकी और अन्य गंभीर आरोप शामिल बताए गए। अदालत ने माना कि इतने बड़े आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति को जमानत देना समाज और कानून व्यवस्था के लिए जोखिम भरा हो सकता है। न्यायालय के इस अवलोकन ने जमानत की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में अदालतें आदतन अपराधियों के मामलों में ज्यादा सतर्क हो गई हैं और केवल राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव के आधार पर राहत देने से बच रही हैं।

जून 2025 से जेल में बंद, समर्थकों को लगा झटका

रीतलाल यादव 13 जून 2025 से इस मामले में जेल में बंद हैं। गिरफ्तारी के बाद से उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि उन्हें जल्द जमानत मिल जाएगी, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले ने उनकी उम्मीदों पर विराम लगा दिया। इस फैसले का असर दानापुर की स्थानीय राजनीति पर भी पड़ सकता है, क्योंकि क्षेत्र में उनका प्रभाव लंबे समय से माना जाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह फैसला आने वाले समय में अपराध और राजनीति के समीकरणों पर भी असर डाल सकता है।

भू-माफियाओं के लिए सख्त संदेश

पटना हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसे बिहार में सक्रिय भू-माफियाओं और दबंग तत्वों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया है कि कानून के सामने किसी का प्रभाव या रसूख मायने नहीं रखता। सरकारी और निजी जमीनों पर अवैध कब्जे के मामलों में हाल के दिनों में प्रशासन और न्यायपालिका दोनों की सख्ती बढ़ी है। ऐसे फैसले लोगों के बीच यह भरोसा भी मजबूत करते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावशाली लोगों तक भी पहुंच सकती है।

अब आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट ही आखिरी उम्मीद

हाई कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद अब रीतलाल यादव के पास देश की सर्वोच्च अदालत जाने का विकल्प बचा है। हालांकि, गंभीर आरोपों और लंबित मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए वहां से राहत मिलना आसान नहीं माना जा रहा। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रह सकता है। फिलहाल इतना तय है कि अदालत के फैसले ने बिहार की कानून व्यवस्था पर एक मजबूत संदेश जरूर दिया है — कानून से ऊपर कोई नहीं।

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