मिलिए NDA के 5 निकम्मे सांसदों से, सांसद निधि का 1 रूपया भी जनता के लिए नहीं किया खर्च

On: Tuesday, January 13, 2026 5:01 PM
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NDA: आज से 2 साल पहले जब लोकसभा चुनाव हुआ था, तो बिहार के कई सांसदों ने अपने लोकसभा क्षेत्र में सड़क, स्कूल, अस्पताल और कई बुनियादी सुविधाओं को लेकर जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन 18वीं लोकसभा चुनाव को बीते दो वित्तीय वर्ष हो गए हैं. अभी भी कई ऐसे सांसद हैं जिन्होंने सांसद निधि फंड का 1 रूपया भी जनता के लिए खर्च नहीं किया है.

सबसे हैरने वाली बात तो यह है कि हम आज जिन पांच सांसदों के बारे में बताने जा रहे हैं वह सभी पांच एनडीए के सांसद है, जिन्होंने अपने लोकसभा क्षेत्र में कोई भी विकास कार्य नहीं किया है. हर सांसद को दो बार पांच- पांच करोड रुपए का फंड जारी किया जा चुका है लेकिन इन सांसदों ने इसमें से कोई रकम भी खर्च नहीं किया.

NDA के इन सांसदों ने नहीं किया 1 रूपया भी खर्च

इन सांसदों में सबसे पहले जनता दल यूनाइटेड के केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का नाम आता है. साथ ही साथ बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी, बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी, डॉक्टर संजय जयसवाल और विवेक ठाकुर…. ये ऐसे एनडीए के बड़े नेता हैं जिन्होंने पिछले 2 साल में एक तिनका बराबर भी काम नहीं करवाया है.

यानी कि अपने फंड से 1 रूपया भी खर्च नहीं किया. सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इन्होंने ना ही विकास किया और ना ही किसी तरह की कोई योजना पेश की, जो पूरी तरह से नॉन परफॉर्मर साबित हुए हैं. जनता ने इन्हें जिस तरह के विकास कार्य के लिए चुना, इन्होंने जनता की उम्मीद पर पूरी तरह पानी फेर दिया.

इन सांसदो ने किया सबसे ज्यादा खर्च

सांसद निधि फंड से खर्च करने के मामले में अगर कोई सबसे आगे है तो उसमें आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह है, जिन्होंने अब तक 12 करोड़ 8 लाख रुपए खर्च कर दिया है. 5 साल के कार्यकाल के दौरान एक सांसद को कुल 25 करोड रुपए मिलते हैं. अभी तक एनडीए के इन सांसदों को दो बार पांच- पांच करोड रुपए का फंड जारी किया जा चुका है.

वोट मिलने के बाद भूल जाते हैं वादे

इन नेताओं ने जनता से जो बड़े-बड़े वादे किए थे, वह जमीनी स्तर पर अधूरे नजर आ रहे हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार में एनडीए के कई ऐसे नेता है जो नीतीश कुमार और पीएम मोदी के नाम पर चुनाव तो जीत जाते हैं, लेकिन जब बात विकास कार्य की आती है तो वह अपने पैर पीछे खींच लेते हैं. एक यह भी वजह है कि चुनाव में आसानी से मिली जीत उन्हें विकास कार्य करने से रोकती है. कई जगह पर नतीजा यह है कि नेता अपने क्षेत्र के लोगों से भी जाकर नहीं मिलते.

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