Bihar Liquor Ban Controversy: बिहार की राजनीति में एक बार फिर शराबबंदी का मुद्दा सुर्खियों में है। राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर लंबे समय से बहस जारी है, लेकिन अब इस मुद्दे ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। मीडिया के सामने राजद एमएलसी सुनील सिंह द्वारा दिया गया बयान न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, बल्कि इससे सरकार की नीतियों और उनकी प्रभावशीलता पर भी नए सवाल खड़े हो गए हैं। विधानसभा परिसर में शराब की डिलीवरी कराने की खुली चुनौती ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।
बुधवार को पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान सुनील सिंह ने शराबबंदी कानून को पूरी तरह असफल बताते हुए दावा किया कि बिहार में बिना भ्रष्टाचार के किसी भी योजना की कल्पना करना मुश्किल हो गया है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने भी शराबबंदी नीति की समीक्षा की जरूरत पर संकेत दिए हैं। ऐसे में विपक्ष का आक्रामक रुख राजनीतिक तापमान बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
Bihar Liquor Ban Controversy: शराबबंदी पर सीधा हमला और विधानसभा में चुनौती
राजद एमएलसी सुनील सिंह ने सरकार को घेरते हुए कहा कि यदि किसी को प्रमाण चाहिए तो वह विधानसभा सत्र के अंतिम दिन सदन परिसर में शराब की डिलीवरी कराकर दिखा सकते हैं। उनका दावा था कि 2016 में शराबबंदी लागू होने के बाद शराब की खपत कम होने के बजाय अवैध तरीके से बढ़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी के कारण अवैध नेटवर्क मजबूत हुआ है और अब युवाओं में “सूखा नशा” तेजी से फैल रहा है, जो समाज के लिए अधिक खतरनाक साबित हो रहा है। उनके अनुसार, प्रतिबंध के बावजूद शराब की उपलब्धता यह साबित करती है कि कानून जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पा रहा।
दरअसल, बिहार में अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, जिसका उद्देश्य सामाजिक सुधार और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को कम करना था। शुरुआती दौर में इसके सकारात्मक परिणामों की चर्चा हुई, लेकिन समय के साथ अवैध शराब तस्करी, गिरफ्तारी और जहरीली शराब की घटनाओं ने नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी।
सरकारी योजनाओं और मुख्यमंत्री की छवि पर भी उठाए सवाल
शराबबंदी पर बयान देने के साथ ही सुनील सिंह ने राज्य सरकार की कई विकास योजनाओं पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ‘नल-जल योजना’, सड़क निर्माण और पुल-पुलिया जैसे विकास कार्यों में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा है। उनके मुताबिक, जिस तरह शराब की कथित होम डिलीवरी की बात सामने आती है, उसी तरह योजनाओं में कमीशन और अनियमितताओं का खेल भी जारी है।
राजद नेता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समाज सुधारक छवि पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सिर्फ कानून बना देने से सामाजिक बदलाव नहीं आता। उन्होंने दहेज प्रथा का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी बिना दहेज के शादियां कम ही देखने को मिलती हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि कानूनों का वास्तविक असर कितना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल शराबबंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। बिहार की राजनीति में शराबबंदी हमेशा भावनात्मक और सामाजिक मुद्दा रही है, इसलिए इस पर दिया गया हर बयान सीधे जनता की राय को प्रभावित करता है।
राजनीतिक माहौल में क्यों बढ़ रही शराबबंदी पर बहस?
हाल के दिनों में राज्य में शराबबंदी कानून को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं की राय सामने आई है। कुछ लोग इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम मानते हैं, तो कुछ इसे व्यावहारिक रूप से असफल नीति बताते हैं। बढ़ती गिरफ्तारियों, अदालतों पर बोझ और अवैध कारोबार की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि शराबबंदी जैसे कानून की सफलता केवल प्रतिबंध से नहीं, बल्कि जागरूकता, रोजगार और प्रभावी निगरानी व्यवस्था से तय होती है। यही कारण है कि समय-समय पर इसकी समीक्षा की मांग भी उठती रही है।
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