Bihar Migrant Workers: हम ‘मजबूर’ हैं साहब… मतदान और छठ के बाद बिहार से फिर शुरू हुआ पलायन, रोजगार की तलाश में दिल्ली-अमृतसर के लिए निकले मजदूर

Bihar Migrant Workers: लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा और बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दोनों चरणों का मतदान संपन्न ... Read more

On: Thursday, November 13, 2025 5:19 PM
Bihar Migrant Workers

Bihar Migrant Workers: लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा और बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दोनों चरणों का मतदान संपन्न होते ही बिहार में पलायन का सिलसिला एक बार फिर से शुरू हो गया है। सहरसा सहित पूरे कोसी क्षेत्र से हजारों प्रवासी मजदूर अपने परिवारों को अलविदा कहकर दिल्ली, अमृतसर, लुधियाना और सूरत जैसे शहरों की ओर रवाना हो रहे हैं। त्योहार और चुनाव की चहल-पहल के बाद अब गांवों में सन्नाटा लौटने लगा है।

Bihar Migrant Workers: सहरसा स्टेशन पर उमड़ी भीड़, मजदूरों ने कहा – “अब फिर वही मजबूरी…”

गुरुवार को सहरसा रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने परिवारों से विदा लेते नजर आए। किसी की आंखों में अपने बच्चों को छोड़ने का दर्द था, तो कोई पत्नी को दिलासा देता दिखा कि “अगली बार जल्दी लौट आएंगे।” मजदूरों ने बताया कि वे हर साल त्योहारों और चुनाव के वक्त गांव आते हैं, लेकिन रोजगार की कमी के कारण उन्हें दोबारा पलायन करना पड़ता है। एक मजदूर ने कहा — “छठ पूजा खत्म हुई, वोट दे दिए, अब पेट की खातिर फिर जाना पड़ रहा है साहब…”

“रोजगार के नाम पर वोट दिया, अब उम्मीद है सरकार कुछ करेगी”

जब इन प्रवासी मजदूरों से मतदान और रोजगार को लेकर बात की गई, तो लगभग हर किसी ने एक ही बात दोहराई “हमने इस बार विकास और रोजगार के मुद्दे पर वोट किया है।” सहरसा के सोनू कुमार ने कहा “हम हर साल यही उम्मीद लेकर वोट करते हैं कि बिहार में काम मिलेगा। लेकिन हालात नहीं बदलते। अब फिर दिल्ली जाना पड़ रहा है।”  वहीं मोहम्मद जाकिर खान ने कहा “हर साल बाहर जाना पड़ता है। चाहत है कि अपने ही राज्य में रोजगार मिले ताकि अपने परिवार के साथ रह सकें।”

त्योहार और चुनाव खत्म, अब फिर वही मजबूरी

प्रवासी मजदूर बादल कुमार ने भावुक होकर कहा “त्योहार और चुनाव खत्म, अब फिर वही मजबूरी… घर छोड़कर बाहर जाना ही पड़ता है।” वहीं मालिक मुखिया ने कहा कि अगर सरकार वाकई बिहार में रोजगार की व्यवस्था करे, “तो पलायन अपने आप रुक जाएगा। मजदूर अपने परिवार के साथ यहीं रहना चाहता है, लेकिन मजबूरी सब पर भारी है।”

हर साल दोहराई जाने वाली कहानी

हर साल की तरह इस बार भी छठ पूजा के बाद बिहार के कई जिलों में वही दृश्य देखने को मिला रेलवे स्टेशन पर भीड़, सिर पर झोला और दिल में परिवार की याद। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया और दरभंगा जैसे जिलों से रोजाना हजारों की संख्या में लोग काम की तलाश में बाहर जा रहे हैं। इनमें से अधिकतर मजदूर निर्माण कार्य, फैक्ट्री और होटल व्यवसाय में काम करते हैं।

नई सरकार से बड़ी उम्मीदें

चुनाव के दौरान नेताओं ने हर मंच से रोजगार सृजन और स्थानीय उद्योग विकास का वादा किया था। अब जब नई सरकार बनने वाली है, तो प्रवासी मजदूरों को उम्मीद है कि “इस बार सिर्फ वादा नहीं, बदलाव भी देखने को मिलेगा।” विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बिहार में लघु उद्योग, कृषि-आधारित रोजगार और ट्रेनिंग सेंटर को बढ़ावा दिया जाए, तो पलायन की यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

छठ पूजा की रौनक और चुनावी माहौल के बाद बिहार के गांवों से मजदूरों का यूं पलायन करना राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। “हम मजबूर हैं साहब…” — यह सिर्फ एक मजदूर का दर्द नहीं, बल्कि बिहार के हर उस परिवार की कहानी है जो अपने घर की खुशियों को छोड़कर पेट की आग बुझाने परदेश जाता है।

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